नर्मदा सी पतित पावनी तुम रही
मैं भी शिवलिंग सा तुम में समाया रहा
रीति के गाँव में प्रीति की अल्पना
साथ बैठे हुए हम बनाते रहे
हाथ में हाथ रख स्वप्न के लोक में
हम प्रणय गीत मिल गुनगुनाते रहे
ब्याज का प्रेम ही तुमको मैं दे सका
मूल अब तक तुम्हारा बकाया रहा
नर्मदा सी पतित पावनी तुम रही
मैं भी शिवलिंग सा तुम में समाया रहा
बिन कहे ही कही सी लगी तुम मुझे
फिर भी मैंने कही अनकही भूमिका
मैने उपमा व उपमेय लाखों लिए
किंतु गीतो की तुम ही रही भूमिका
तुम लगी पूर्णिमा की हो पूनम प्रिये
और घटा बन के तुम पे मैं छाया रहा
नर्मदा सी पतित पावनी तुम रही
मैं भी शिवलिंग सा तुम में समाया रहा
~ शिवांश शुक्ला ‘सरस’
अहा ! अद्भुत सृजन