हकीक़त से पर्दा उठाने चले हैं

 

हकीक़त से पर्दा उठाने चले हैं

तुम्हें राज़-ऐ-दिल हम बताने चले हैं

 

भरे हैं जो दिल में ग़मों के खजाने

उन्हें महफ़िलों में लुटाने चले हैं

 

खबर तक नहीं है जिन्हें कुछ हमारी

उन्हीं पे ही खुद को मिटाने चले हैं

 

यहां आशिकों का यही मसअला है

ये जीवन धुएं में उड़ाने चलें हैं

 

सिखाया था हमने जिन्हें कल बहुत कुछ

वही आज हमको सिखाने चले हैं

 

लिखेंगे गजल एक दिन उन पे भी हम

अभी नाम उनका छुपाने चले हैं

 

                         – भारत मौर्या 

 

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